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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्ख्यज्ञानं मय़ा प्रोक्तं योगज्ञानं निवोध मे |  १   क
यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्त्वेन नृपसत्तम ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति