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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्चानामिन्द्रिय़ाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा |  १३   क
शव्दं स्पर्शं तथा रूपं रसं गन्धं तथैव च ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति