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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल |  १४   क
इन्द्रिय़ग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति