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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
एवं हि परिसङ्ख्याय़ ततो ध्याय़ेत केवलम् |  १६   क
विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति