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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
तस्थुषं पुरुषं सत्त्वमभेद्यमजरामरम् |  १७   क
शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं व्रह्म चाव्ययम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति