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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रादिभिस्तै; र्हतान्पाञ्चालान्द्रौपदेय़ांश्च सुप्तान् |  १५३   क
कृतं वीभत्समय़शस्यं च कर्म; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति