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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
संय़तात्मा भय़ात्तेषां न पात्राद्विन्दुमुत्सृजेत् |  २३   क
तथैवोत्तरमाणस्य एकाग्रमनसस्तथा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति