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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
स्थिरत्वादिन्द्रिय़ाणां तु निश्चलत्वात्तथैव च |  २४   क
एवं युक्तस्य तु मुनेर्लक्षणान्युपधारय़ेत् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति