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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
स युक्तः पश्यति व्रह्म यत्तत्परममव्ययम् |  २५   क
महतस्तमसो मध्ये स्थितं ज्वलनसंनिभम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति