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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
इत्यहं रौक्मिणेय़स्य पृच्छतो भरतर्षभ |  ४९   क
माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति