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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
रुद्रप्रधानानपरान्विद्धि योगान्परन्तप |  ५   क
तेनैव चाथ देहेन विचरन्ति दिशो दश ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति