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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
यावद्धि प्रलय़स्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन वै |  ६   क
योगेन लोकान्विचरन्सुखं संन्यस्य चानघ ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति