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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
तथैवोत्क्रममाणं तु शृणुष्वावहितो नृप |  १   क
पद्भ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति