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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव |  १०   क
आत्मच्छाय़ाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सराय़ुषः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति