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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
शवगन्धमुपाघ्राति सुरभिं प्राप्य यो नरः |  १४   क
देवताय़तनस्थस्तु षड्रात्रेण स मृत्युभाक् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति