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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽऽत्मवान् |  १७   क
निशि चाहनि चात्मानं योजय़ेत्परमात्मनि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति