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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
सर्वगन्धान्रसांश्चैव धारय़ेत समाहितः |  १९   क
तथा हि मृत्युं जय़ति तत्परेणान्तरात्मना ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति