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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
पाय़ुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुय़ात् |  ३   क
पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां तु प्रजापतिम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति