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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान्नासाभ्यामिन्दुमेव च |  ४   क
वाहुभ्यामिन्द्रमित्याहुरुरसा रुद्रमेव च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति