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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
ग्रीवाय़ास्तमृषिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम् |  ५   क
विश्वेदेवान्मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुय़ात् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति