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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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भीष्म उवाच
तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च |  १०३   क
अहङ्कारात्परं चापि स्थानानि समवाप्नुय़ात् ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति