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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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भीष्म उवाच
एतन्मय़ाप्तं जनकात्पुरस्ता; त्तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् |  १०५   क
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा; ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति