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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससङ्ग्रहम् |  १६   क
चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति