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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् |  १७   क
विप्रिय़ार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति