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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ततः सशिष्येण मय़ा सूर्येणेव गभस्तिभिः |  १८   क
व्याप्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति