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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
सपुत्रदाराः सुक्रूरा दुर्दर्शनसुनिर्घृणाः |  १३०   क
विविधानि च रूपाणि तत्रादृश्यन्त रक्षसाम् ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति