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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेय़ं निष्कलमेव च |  ३९   क
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति