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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्गोपाङ्गानपि यदि पञ्च वेदानधीय़ते |  ४८   क
वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति