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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद्गन्धर्वसत्तम |  ४९   क
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं नापि वा घृतम् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति