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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ततः प्रणम्य शिरसा मय़ोक्तस्तपतां वरः |  ५   क
यजूंषि नोपय़ुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति