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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
यदा तु पश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप |  ५३   क
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति