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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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विश्वावसुरु उवाच
जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य च मे श्रुतम् |  ५७   क
पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति