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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम |  ६७   क
जिज्ञाससि च मां राजंस्तन्निवोध यथाश्रुतम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति