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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
अवुध्यमानां प्रकृतिं वुध्यते पञ्चविंशकः |  ६८   क
न तु वुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति