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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु |  ७   क
विवृतं च ततो मेऽऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति