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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
पतेद्द्यौर्हिमवाञ्शीर्येत्पृथिवी शकलीभवेत् |  ११७   क
शुष्येत्तोय़निधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति