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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
यत्ते पृष्टं तन्मय़ा चोपदिष्टं; याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व |  ९०   क
राजन्गच्छस्वैतदर्थस्य पारं; सम्यक्प्रोक्तं स्वस्ति तेऽस्त्वत्र नित्यम् ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति