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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते |  १००   क
तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् |  १००   ख
संश्लिष्टा नाभिजाय़न्ते यथाप इह पांसवः ||  १००   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति