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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
गुणस्त्वेवापरस्तत्र सङ्घात इति षोडशः |  १०७   क
आकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन्समाश्रितौ ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति