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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति |  ११३   क
व्यक्तं चासां तथैवान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति