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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
सेय़ं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता |  ११५   क
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति