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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
आत्मन्येवात्मनात्मानं यथा त्वमनुपश्यसि |  १२६   क
एवमेवात्मनात्मानमन्यस्मिन्किं न पश्यसि |  १२६   ख
यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि ||  १२६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति