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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजय़े सन्धिविग्रहे |  १२८   क
कृतवान्यो महीपाल किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||  १२८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति