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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
लोकेश्वरप्रभुत्वं हि महदेतद्दुरात्मभिः |  २४   क
राज्यं नामेप्सितं स्थानं न शक्यमभिरक्षितुम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति