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शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
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नारद उवाच
दुःखोपघाते शारीरे मानसे वाप्युपस्थिते |  ११   क
यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिन्तय़ेत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति