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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति |  १३५   क
गृहे शय़नमप्येकं निशाय़ां यत्र लीय़ते ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति