शान्ति पर्व  अध्याय ३०८

भीष्म उवाच

स्नाह्यालभ पिव प्राश जुहुध्यग्नीन्यजेति च |  १४२   क
वदस्व शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ||  १४२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति