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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
दाने कोशक्षय़ो ह्यस्य वैरं चाप्यप्रय़च्छतः |  १४४   क
क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ||  १४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति