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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
यं यमुद्दिश्य दीय़ेरन्देवं सुमनसः प्रभो |  २१   क
मङ्गलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति