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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
नेत्राभ्यां नेत्रय़ोरस्य रश्मीन्संय़ोज्य रश्मिभिः |  १७   क
सा स्म सञ्चोदय़िष्यन्तं योगवन्धैर्ववन्ध ह ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति